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48 की उम्र में छोड़ी एमएनसी की नौकरी, 1 लाख से शुरू स्टार्टअप आज 15 करोड़ का कारोबार

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आमतौर पर माना जाता है कि स्टार्टअप का सफर जवानी के शुरुआती दौर में ही शुरू होना चाहिए, लेकिन चेन्नई के लोकेश्वरन कन्‍नन ने इस सोच को गलत साबित कर दिया। 28 साल तक आईटी सेक्टर में काम करने और एक बहुराष्ट्रीय कंपनी में ऊंचे पद पर रहने के बाद उन्होंने 48 साल की उम्र में नौकरी छोड़ने का फैसला किया। परिवार और परिचितों ने इसे जोखिम भरा कदम बताया, कुछ ने तो उन्हें गैर-जिम्मेदार तक कह दिया, मगर लोकेश्वरन को अपने सपने पर पूरा भरोसा था।
दिसंबर 2019 में महज एक लाख रुपये की पूंजी, एक टेबल-कुर्सी और साधारण संसाधनों के साथ उन्होंने ‘ईऑर्बिटर’ नाम से कंपनी शुरू की। शुरुआत के कुछ ही हफ्तों बाद कोरोना महामारी ने पूरी दुनिया को ठप कर दिया। बड़ी-बड़ी आईटी कंपनियां संघर्ष कर रही थीं, लेकिन लोकेश्वरन ने संकट को अवसर में बदल दिया। उन्होंने डेटा सेंटर मेंटेनेंस और साइबर सुरक्षा जैसी उन सेवाओं पर ध्यान दिया, जिनकी जरूरत लॉकडाउन में सबसे ज्यादा थी। पहला ऑर्डर केवल 14 हजार रुपये का था, पर यही छोटा कदम आगे चलकर बड़े सफर की नींव बन गया।
आज ईऑर्बिटर देश की प्रमुख सिस्टम इंटीग्रेटर कंपनियों में गिनी जाती है। गुजरात मेट्रो रेल, अशोक लेलैंड, जोहो और हैदराबाद पुलिस कमांड सेंटर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान इसके ग्राहक हैं। कंपनी की टीम डेटा सेंटर क्रैश जैसी जटिल समस्याओं को बेहद कम समय में दुरुस्त कर देती है, इसलिए इसे आईटी जगत का ‘डॉक्टर’ कहा जाने लगा है। लोकेश्वरन का जोर केवल उपकरण बेचने पर नहीं, बल्कि भरोसेमंद और दीर्घकालिक सेवा देने पर है।
पांच साल के भीतर कंपनी का टर्नओवर 15 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच चुका है और अगले वर्ष इसके 30 करोड़ के आंकड़े को छूने की उम्मीद है। इस सफलता के पीछे लोकेश्वरन का वित्तीय अनुशासन सबसे अहम कारण माना जाता है। वे वेंडरों का भुगतान समय पर करते हैं, कर्मचारियों को पहली तारीख को वेतन मिलता है। इसी भरोसे की बदौलत बैंकों ने बिना किसी संपत्ति गिरवी रखे कंपनी को 5 करोड़ रुपये की ओवरड्राफ्ट सुविधा दी, जो किसी एमएसएमई के लिए बड़ी उपलब्धि है।
भारत के 11 शहरों में विस्तार के बाद फरवरी 2025 में कंपनी ने यूएई में भी कदम रख दिया है। लोकेश्वरन कर्मचारियों के हितों को सर्वोपरि रखते हैं—पांच दिन का कार्य सप्ताह, कैशलेस स्वास्थ्य बीमा और पारिवारिक माहौल उनकी कार्यसंस्कृति की पहचान है। उनका मानना है कि असली सफलता मुनाफे में नहीं, बल्कि उन पचास से ज्यादा परिवारों की खुशहाली में है जो आज इस सफर का हिस्सा हैं।
लोकेश्वरन कन्‍नन की कहानी बताती है कि उद्यमिता की कोई उम्र नहीं होती। सही दृष्टि, ईमानदार मेहनत और धैर्य हो तो नया अध्याय जिंदगी के किसी भी मोड़ पर लिखा जा सकता है।

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